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करोड़ों की पुलिया के बाद लाखों का रपटा भी पहली बारिश में बहा,  प्रतापपुर में निर्माण कार्यों पर उठे गंभीर सवाल, जांच के आदेश से बढ़ी उम्मीद

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Bureau Report
प्रतापपुर। प्रतापपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत धोन्धा–गोविंदपुर–रमकोला मार्ग एक बार फिर निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर चर्चा में है। कुछ वर्ष पहले इसी मार्ग पर करोड़ों रुपये की लागत से बनी पुलिया गर्मी के दिनों में बीचों-बीच क्षतिग्रस्त होकर ढह गई थी। उस समय भी निर्माण की गुणवत्ता और संभावित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठे थे। अब उसी मार्ग पर आवागमन बहाल करने के लिए लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) द्वारा बनाया जा रहा लाखों रुपये का अस्थायी रपटा पहली ही तेज बारिश में बह जाने से ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर सरकारी धन से बनने वाले निर्माण कार्य इतने कमजोर क्यों साबित हो रहे हैं।
करोड़ों रुपये की पुलिया टूटने के बाद धोन्धा, गोविंदपुर, रमकोला सहित दर्जनों गांवों का संपर्क प्रभावित हो गया था। स्कूली बच्चों, किसानों, मरीजों और आम ग्रामीणों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। जनसमस्या को देखते हुए शासन-प्रशासन एवं क्षेत्रीय विधायक की पहल पर पीडब्ल्यूडी द्वारा लगभग 45 मीटर लंबा रपटा बनाया जा रहा था, ताकि स्थायी पुल बनने तक लोगों का आवागमन सुचारु बना रहे।
ग्रामीणों के अनुसार रपटा निर्माण का कार्य लगभग दो माह से चल रहा था। इस दौरान कई ग्रामीणों ने निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल भी उठाए थे। उनका कहना था कि कार्य मानकों के अनुरूप नहीं हो रहा है और यदि समय रहते गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया तो पहली बारिश में ही निर्माण टिक नहीं पाएगा। ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
बीते दिनों क्षेत्र में हुई तेज बारिश के कारण नदी-नाले उफान पर आ गए। इसी दौरान तेज बहाव में नया बना रपटा पूरी तरह बह गया। इससे एक बार फिर दर्जनों गांवों का संपर्क टूट गया और ग्रामीणों की परेशानियां बढ़ गईं। लोगों का कहना है कि जिस निर्माण पर लाखों रुपये खर्च किए गए, वह पहली ही बारिश का सामना नहीं कर सका। इससे निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
इस पूरे मामले में ग्रामीणों और पीडब्ल्यूडी विभाग के दावों में भी विरोधाभास सामने आ रहा है। पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों ने जिला प्रशासन को बताया है कि रपटा निर्माण कार्य अभी पूर्ण नहीं हुआ था और निर्माणाधीन अवस्था में अचानक आई बारिश के कारण वह बह गया। दूसरी ओर ग्रामीणों का दावा है कि रपटा लगभग तैयार हो चुका था और उस पर लोगों का आवागमन भी शुरू हो गया था। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर वास्तविक स्थिति क्या थी? यदि निर्माण कार्य अधूरा था तो लोगों के आवागमन की व्यवस्था क्यों की गई? और यदि कार्य पूर्ण हो चुका था तो पहली ही बारिश में उसके बह जाने की जिम्मेदारी किसकी होगी?
एक और महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि रपटा का निर्माण लगभग दो माह से चल रहा था तो बरसात शुरू होने से पहले इसे तकनीकी मानकों के अनुरूप पूरा क्यों नहीं किया गया? वर्षा ऋतु में नदी के तेज बहाव के बीच निर्माण कार्य करना कितना व्यावहारिक और सुरक्षित था, इसकी भी जांच आवश्यक मानी जा रही है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सूरजपुर कलेक्टर रैना जमील ने दूरभाष पर चर्चा के दौरान बताया कि उन्हें घटना की जानकारी मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि यह गंभीर मामला है और पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों को तत्काल आवश्यक निर्देश दिए गए हैं। विभाग ने उन्हें बताया है कि रपटा निर्माण कार्य जारी था और अचानक आई तेज बारिश के कारण वह बह गया। विभाग द्वारा पुनः मरम्मत एवं निर्माण कराए जाने की बात कही गई है। कलेक्टर ने यह भी स्पष्ट किया कि पूरे मामले की जांच कराई जाएगी तथा इसके लिए जांच दल गठित कर दिया गया है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
अब पूरे मामले की निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं। यदि जांच में निर्माण कार्य में तकनीकी लापरवाही, गुणवत्ता में कमी या वित्तीय अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों, निर्माण एजेंसी और संबंधित ठेकेदार के विरुद्ध कार्रवाई की उम्मीद की जा रही है।
फिलहाल इतना तय है कि पहले करोड़ों रुपये की पुलिया और अब लाखों रुपये का रपटा सवालों के घेरे में है। सरकारी धन से बनने वाले निर्माण कार्य यदि कुछ ही समय में धराशायी हो जाएं तो जनता का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है। ग्रामीणों ने निष्पक्ष तकनीकी जांच, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई तथा स्थायी एवं गुणवत्तापूर्ण पुल निर्माण की मांग की है, ताकि भविष्य में जनता को बार-बार ऐसी परेशानी और सरकारी धन की बर्बादी का सामना न करना पड़े।
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