बिश्रामपुर की श्रमिक कॉलोनी में जलसंकट से हाहाकार, दो पंप खराब और ट्रांसफार्मर जला; नगर पंचायत
के बोरिंग के भरोसे बुझ रही प्यास, कोयला उत्पादन करने वाले कर्मचारियों के परिवारों की सुध लेने वाला कोई नहीं
बिश्रामपुर। कोयला उत्पादन के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले एसईसीएल के श्रमिकों को अब अपने ही परिवारों के लिए पीने का पानी जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। बिश्रामपुर की एसईसीएल श्रमिक कॉलोनी में पिछले चार दिनों से गंभीर जलसंकट बना हुआ है। फिल्टर प्लांट के दो पंप खराब होने और जलापूर्ति व्यवस्था को संचालित करने वाला विद्युत ट्रांसफार्मर जल जाने से करीब 2250 आवासों में रहने वाले दो हजार से अधिक परिवार प्रभावित हैं। हालात ऐसे हैं कि लोगों को पानी के लिए सुबह से ही भटकना पड़ रहा है।
जानकारी के अनुसार एसईसीएल बिश्रामपुर क्षेत्र की श्रमिक कॉलोनी में पेयजल आपूर्ति के लिए फिल्टर प्लांट स्थापित किया गया है। नदी प्लांट में जलापूर्ति के लिए तीन पंप लगाए गए हैं, लेकिन इनमें से दो पंप लंबे समय से खराब पड़े हैं। दो नंबर पंप का आवश्यक कलपुर्जा उपलब्ध नहीं होने के कारण वह करीब पखवाड़े भर से बंद है। वहीं दूसरा पंप भी खराब हो गया है। ऐसे में पूरी जलापूर्ति व्यवस्था एकमात्र चालू पंप के भरोसे रह गई है।
मुसीबत तब और बढ़ गई, जब जलापूर्ति व्यवस्था को संचालित करने वाला विद्युत ट्रांसफार्मर भी पिछले चार दिनों से जला पड़ा है। इसके चलते कॉलोनी में नियमित पानी की आपूर्ति पूरी तरह प्रभावित हो गई है। चार दिनों से नलों में पानी नहीं आने के कारण श्रमिक परिवारों के सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है।
नगर पंचायत के बोरिंग बने एकमात्र सहारा
जलसंक
ट से परेशान कॉलोनी की महिलाओं का कहना है कि पानी के लिए सुबह से ही जद्दोजहद करनी पड़ रही है। घर के जरूरी कामकाज से लेकर पीने के पानी तक के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है। नगर पंचायत प्रशासन द्वारा कॉलोनी क्षेत्र में कराए गए बोरिंग ही अब लोगों के लिए सहारा बने हुए हैं। महिलाओं ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जिन श्रमिकों की मेहनत से एसईसीएल का कोयला उत्पादन होता है, उन्हीं के परिवारों को बुनियादी सुविधा के लिए परेशान होना पड़ रहा है।
मरम्मत के दावों पर उठे सवाल
श्रमिक कॉलोनियों में अनियमित जलापूर्ति और दूषित पानी मिलने की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं। इसके बावजूद व्यवस्था में सुधार नहीं होना प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। मरम्मत के नाम पर खर्च होने वाली राशि और जरूरी कलपुर्जों की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब फिल्टर प्लांट में बार-बार तकनीकी खराबी आ रही है तो स्थायी समाधान की दिशा में अब तक क्या कदम उठाए गए? पंपों के आवश्यक कलपुर्जे समय पर क्यों नहीं मंगाए गए? ट्रांसफार्मर जलने के बाद वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? आखिर कब तक श्रमिक परिवार पानी जैसी बुनियादी सुवि
धा के लिए परेशान होते रहेंगे?
फिलहाल दो हजार से अधिक परिवारों की निगाहें एसईसीएल प्रबंधन पर टिकी हैं। जरूरत इस बात की है कि खराब पंपों और ट्रांसफार्मर की तत्काल मरम्मत कराकर नियमित जलापूर्ति बहाल की जाए, ताकि श्रमिक परिवारों को इस गंभीर संकट से राहत मिल सके।









