बलरामपुर / गर्मी के मौसम में जब जंगलों में तेंदूपत्ता संग्रहण का कार्य शुरू होता है, तब जिले के हजारों ग्रामीण परिवारों के चेहरों पर उम्मीद
की नई चमक दिखाई देने लगती है। सुबह की पहली किरण के साथ महिलाएं, बुजुर्ग और युवा जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं। हाथों में टोकरी, सिर पर गमछा और मन में परिवार की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी लेकर वे मेहनत से तेंदूपत्ता संग्रहण का कार्य करते हैं।
बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के वनांचल क्षेत्रों में तेंदूपत्ता केवल वन उपज नहीं, बल्कि ग्रामीणों की आजीविका का मजबूत आधार बन चुका है। शासन द्वारा संग्रहण के एवज में दिए जाने वाले पारिश्रमिक और प्रोत्साहन राशि ने ग्रामीण परिवारों के जीवन में बड़ा बदलाव लाया है।
विकासखंड बलरामपुर के ग्राम पंचायत पचावल निवासी 50 वर्षीय श्रीमती तारकली सोनवानी बताती हैं कि
पहले गर्मी का मौसम उनके परिवार के लिए कठिनाइयों से भरा होता था। खेती का काम कम हो जाता था और घर चलाने में परेशानी होती थी। लेकिन अब तेंदूपत्ता संग्रहण से उन्हें हर वर्ष अच्छी आमदनी हो जाती है। वे कहती हैं, सुबह जल्दी जंगल जाते हैं, पत्ता तोड़ते हैं और फड़ में जमा करते हैं। शासन से मिलने वाला पैसा सीधे खाते में आता है, जिससे आवश्यक जरूरतें पूरी हो जाती है।
वे कहती हैं कि तेंदूपत्ता संग्रहण से उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद मिली है। पहले मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों में जाना पड़ता था, लेकिन अब गांव में ही रोजगार मिल रहा है। उन्होंने बताया कि शासन द्वारा समय पर भुगतान और बोनस राशि मिलने से ग्रामीणों का भरोसा और बढ़ा है।
तेंदूपत्ता संग्रहण कार्य में महिलाओं की भागीदारी भी बड़ी संख्या में देखने को मिलती है। महिलाएं घर और परिवार की जिम्मेदारियों के साथ जंगल जाकर पत्ता संग्रहण करती हैं। इससे उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत होने का अवसर मिल रहा है। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि तेंदूपत्ता से मिलने वाली आय से वे अब बच्चों के लिए, घरेलू जरूरतों का सामान आसानी से खरीद पा रही हैं।
जिले में तेंदूपत्ता संग्रहण कार्य को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए वन विभाग द्वारा फड़ मुंशियों और समिति के माध्यम से लगातार निगरानी की जा रही है। संग्रहणकर्ताओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने और पारिश्रमिक भुगतान में पारदर्शिता बनाए रखने के प्रयास किए जा रहा हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि शासन की पहल केवल रोजगार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है। जंगलों से जुड़ी पारंपरिक आजीविका को संरक्षण मिलने के साथ-साथ लोगों का पलायन भी कम हुआ है। तेंदूपत्ता संग्रहण का यह कार्य आज हजारों परिवारों के लिए सहारा बन चुका है। हरा सोना जंगल की हरी पत्ती ग्रामीणों के जीवन में आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही है।
उल्लेखनीय है कि तेंदूपत्ता संग्रहण आदिवासी समुदायों की आजीविका का मुख्य आधार है, जिसके लिए शासन द्वारा 5,500 प्रति मानक बोरा प्रोत्साहन राशि दी जाती है। वर्ष 2025 में 105261 संग्राहकों का 633532680 रुपये की राशि का पारिश्रमिक भुगतान किया गया










